Sunday, June 10, 2012
पुरे एक साल मै इस भूलभुलैया मै भटकता रहा उस एकमात्र सही दरवाजे कि ताकाश मे किन्तु मुझे मालूम न था कि आखिर उस दरवाजे के पीछे क्या होगा? इस किताब मे मौजूद सरे दरवाजे मेने इस एक साल मे खोलकर देख डाले, किन्तु सारे दरवाजों के पीछे एक लम्बी और भीमकाय दीवार के आलावा कुछ नहीं था।
पुष्ठो ३६८ से ३८४ के बिच एक दरवाज़ा है। इन पुष्ठो
के बिच ही रस्कोलनिकोव सोनिया के समक्ष अपना अपराध स्वीकार करता है कि 'उसने ही उस खूसट सूदखोर बुढी़या की हत्या की' और 'क्यू' ? उस की दलीलों मे वह दरवाज़ा मौजूद है। इस दरवाजे को खोलने के बाद मुझे मालूम हुवा कि "क्राइम एंड पनिशमेंट" के असली दस्तावेज़ तो दोस्तोवस्की ने यहाँ इस गुप्त द्वार के पीछे छुपा रक्खे है...दोस्तोवस्की कि असली कहानी इस द्वार के पीछे मोजूद है। उस कहानी मे न रस्कोलनिकोव मोजूद है, न वह बूढी सूदखोर महिला, न ही मजलूम सोनिया....सिर्फ एक अपराध-भाव मोजूद है, वह अपराध-बोध किसी की मृत्यु से नहीं नहीं गोया जीवन की मूल्यहीनता से उपजा है।
Friday, May 25, 2012
कविता के पक्ष मे
बादल, बस्ती, बचपन, बयारे'
यह सब और कुछ नहीं
चहरे है कहानियों मे।
और कथा एक गाँव है।
जिसे लेखक आबाद करता है ,
मिलो पृष्ठ उसमे बसता है
और वहा चिपकता है
कई चेहरे अपने इतिहास के।
वह चेहरे हे जेसे खोखल मे जमा बरसात का पानी,
लेखक की स्याही उसी पानी से बनी है
जबकि मै औ कोंध तुम्हारा पुजारी हूँ
इसलिए मै करता हूँ तुम्हारा आह्वाहन
बार बार, सालों से
क्योंकी मेरी कविता मुझमे कोंध सी प्रकट होती है
शब्दातीत, एक खालिस ध्वनी
सिर्फ एक तडकती गडगडाहट
जिसका कोई नाम नहीं
न ही कोई चेहरा
और कविता मे शब्द होते है
जेसे तेज़ बहते पानी पर बहती कागज़ की नावें
लव
Saturday, May 19, 2012
Saturday, May 5, 2012
जबतक वह नींद मे है
तब तक शोरगुल चुप्पी ओढ़े सो रहा है
और मस्ती थमी हुई गाडियों के साथ
आराम अरमा रही है
जबतक वह नींद मे है
भागमभाग स्टेंड पर खाड़ी
साईकिल कि तरह सुस्ता रही है
और सरे हठ सन्यासियों जेसी आंखे मूंदे
इच्छाओ के पर चले गए है
जबतक वह नींद मे है
शांति रानी बन बेठी है लेकिन
हर पाल उसे अपने राज पर
एक खतरा सा महसूस होता है
और बंद पलकों पर टिका
उसका सिंहासन डोलता रहता है
जबतक वह नींद मे है...
--हेमंत देवलेकर
Friday, May 4, 2012
शहर झूट बोलता है
जलतरंग का एक बड़ा सा कटोरा
और चांदनी उससे बहता
एक उजाड़-सा राग है
साँझ की शाखों मे समाहित हो चूका है
दिवस का सारा कोतुहल
इसलिए पत्तियां अब महज़ पर्छाइयाँ भर है
जिस पर दिपती है उजाड़ राग की प्रतिछाया
सच मे चाँद इतिहास का सबसे उदास प्राणी है
वोह बंजारों के उदास गीत गता है
अपना मुंडा हुवा सर टहनियों से टिकाए
गोया शहर झूट बोलता है
उसकी व्यस्तता उसका प्रबल ढोंग है
वह उदास चाँद को देखता नहीं जानकर
जानकर नहीं सुनता उसका गीत
शहर इस कदर व्यस्त है
कि अपनी व्यस्तताओ से वह एक दिन
मनो पा जायेगा सत्य को
वह जानकर नहीं देखता ...
उसे अपनी रिक्तता का आभास है
शायद इस लिए!
किन्तु वह जतलाना नहीं चाहता खुदको भी
शायद उसे डर है
कि कही वह चटख न जाए उसका
भ्रम का आईना
एक रात जब सो चुकी थी सारी गलियां
और चोराहे
स्ट्रीट लेम्प जो मोहल्लो कि आंखे है
किसी रात के चोकीदार कि तरह उंघ रही थी
खुलती और झपकती थी उसकी पलके
और फिर बंद हो जाया करती
और रात के वैभव से परेशान कुत्ते
उसे अपनी भोंक से जगाने की
कोशिश मे थे निरंतर
उसी रात अपनी दोमुंही छत से तकते हुवे
मेने देखा
बंधा हुवा किसी जादू से शहर चुपके से चला जा रहा है
उस उजाड़ राग की आवाज़ के पीछे-पीछे
उस रात के कुछ आखरी पहरों मे
शहर अपनी गलियों को छोड़ जाता है
शहर अपना दम रोक लेता है
थाम देता है अपनी नब्ज़ की थरथाराह्टो को
और चाँद के गले मे हाथ डाले
चाँद के साथ
निकल पड़ता है शहर छोडती सुदूर राहों पर
--लव वर्मा
Tuesday, April 24, 2012
मै अँधेरे में चलता हूँ, लडखडाता हूँ
और उठता हूँ, और चलता हूँ बिना देखे शांत पत्थरो
और सूखे पत्तो पर पड़ते है मेरे पैर
कोई मेरे पीछे चल रहा है, पत्थरो,पत्तो पर पेर रखता
मै धीमा चलूँ तो वह धीमा चलता है
मै दोंडू तो वह दोंड़ता है, मै मुड़ता हूँ; कोई नहीं
इन मोड़ पर और और मुड़ते हुवे जो जाते है गली की और
जहा कोई नहीं कटा मेरा इंतज़ार, कोई नहीं करता मेरा पीछा
जहा मै पीछा करता हूँ एक आदमी का जो लडखडाता है
और उठता है और जब देखता है मुझे,कहता है; कोई नहीं --पाज़
Tuesday, April 3, 2012
एक चिथड़ा सुख
चुप,सुलगते बिम्ब, जो बिम्बों से नहीं
छवियों से है।
और उनके बोलते दायरे
जो विस्तृत होकर भी
छोटे संकरे गलियारों से है।
एक चिथड़ा सुख... असमानों का,
उसके बिम्बों का और
बिम्बों के दायरों का।
धुप, छाव और धुंध
है तलाश मै एक दूजे की।
तलाश! बंद मुट्ठी मै सोया स्वप्न।
जिसे जगाना है असंभव
वह स्वप्न बस अपने ही दिवास्वप्न मे
वोह तलाश पूरी करता है।
एक चिथड़ा सुख.....धुप, छाव, और धुंध का।
समय कि सुरंग मै बहते हम
एक दूजे का हाथ थाम कर भी
किन्ही दूसरी दिशाओं मे बहते जाते है
इस सुरंग मे क्यों बहते जाते है हम ?
पता नहीं कहां पहुचते है? लेकिन
कोई खिचता जाता है अन्थो दिशाओ से हमें।
चार से समय
चार से सुख
एक चिथड़ा सुख..... सुबह से शाम...रात से दिन...
Sunday, March 25, 2012
सरे तथाकथित धर्म और धार्मिक लोग इस वाक्य से चुक गए है। जब हरी अनंत है और हरी कथा भी तो हरी और हरी कथा परस्पर कही भी मोजूद हो सकते है। वोह कथा गीता मे मोजूद हो सकती है, कुरान मे, बाईबल मे, धम्पद मे, तोलोस्तोय के वार एंड पिस मे,पुनरुथान मे, अन्ना केरिनिना मे, दोस्तोवस्की के अपराध और दंड मे, काफ्का के मेटामोरफौसीस मे, इन द पेनल कालोनी मे, उन कि लघु कथाओ मे, उन के संवादों मे, उन के पत्रों मे, वान गौघ की जीवनी मे,ओलेनिनिं के प्रेम मे, सूफियों के हिज्र मे, कही भी।
सदर वन्दे
Friday, March 16, 2012
उन की यह कविता यहाँ प्रतुत कर रहा हूँ जिससे हमें यह ज्ञात होता है की किस तरह एक सन्यासी मे भी कविता की धारा विस्तारीत होती है -:
शांति
देखो जो बलात आती है,
वह शक्ति शक्ति नहीं है।
वह प्रकाश प्रकाश नहीं है,
जो अँधेरे के भीतर है,
और न वह छाया, छाया ही है
जो चकाचोंध करने वाले
प्रकाश के साथ है।
वह आनंद है, जो कभी व्यक्त नहीं हुवा
और अनभोगा, गहन दुःख है
अमर जीवन जो, जिया नहीं गया
और अनंत मृत्यु, जिस पर -
किसी को शोक नहीं हुवा।
न दुःख है, न सुख
सत्य वह है,
जो इन्हें मिलाता है।
न रात है, न प्रात
सत्य वह है,
जो इन्हें जोड़ता है।
वह संगीत मे मधुर विराम,
पावन छंद के बिच यति है,
मुखरता के मध्य मोन,
वासनाओ के विस्फोट के बिच
ह्रदय की शांति है।
सुन्दरता वह है जो देखी न जा सके।
प्रेम वह है जो अकेला रहे।
गीत वह है, जो जिए, बिना गाये।
ज्ञान वह है जो कभी जाना न जाए।
जो दो प्राणों के बिच मृत्यु है,
और दो तुफानो के बिच एक स्तब्धता है,
वह शुन्य जहा से सॄश्टि आती है
और जहा वह लौट जाती है ।
वाही अस्रुबिंदु का अवसान होता है,
प्रसन्न रूप को प्रस्फुटित करने को
वाही जीवन का चरम लक्ष है,
और शांति ही एकमात्र शरण है।
Thursday, March 15, 2012
अभागे है प्रेमी लोग
ओह प्रेम !
तुम एक असीम इन्द्रधनुष हो
असंख्य रंगों वाले,
लेकिन प्रेमी लोग अभागे है।
वह तुम पर चलते-टहलते हुवे भी
स्पर्श कर पते है
तुम्हारे किसी एक रंग को ही।
कभी वे चलते है तुम्हारी लाल पकदंडीयो पर,
कभी वे मिलकर हरी पर होते है साथ साथ ,
और कभी एक पिली पर होता है तो
दूजा काली पर।
अदभूत है यहाँ चलना, यहाँ टहलना,
विस्मय से भरा,
लेकिन प्रेमी लोग कभी न जान पाए
तुम्हारे पूर्ण वुत्त को।
प्रेम मे डुबे संपूर्ण प्रेमी वे है
जो जानते है इन्द्रधनुष होना ।
वे ही चदा पते है परस्पर
अपने हृदयों पर प्रत्यंचा
Tuesday, August 23, 2011
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8.8.2011
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Friday, April 1, 2011
Monday, March 7, 2011
Sunday, February 27, 2011
''इन द पिनल कालोनी'' के बाबत



और खुद को भेदता हुवा जाता है उसका लेखन
आत्मा के घूप्प अंधियारे तलो तक ।
''फ्रान्ज़ काफ्का'' मुझे कई बार यह नाम एक किवदंती-सा महसूस होता है, उसका चरित्र ही कुछ ऐसा है मनो वह प्राचीन रोम का कोई देवता हो... मनुष्य के भीतर अकारण ही व्याप्त उस व्यथा ,त्रासऔर यातनाओ का देवता ।
''काफ्का'' नाम के आह्वाहन मात्र से ही संपूर्ण मानवता के यातनाओ के भावर साक्षात् हो उठते है, उसका पीडाओ से भरा स्याह चेहरा नरख की ज्वाला के समान दहक उठता हे । निसंदेह यह एक विलक्षित व्यक्ति का चरित्र-चित्रण है, विलक्षित इसलिए क्योकि काफ्का ने एक मूल्यवान खोज की है वह हे ''व्यक्ति के भीतर व्याप्त वह अज्ञात पीड़ा'', यह पीड़ा सदियों से एक आज्ञात चीज़ रही है और आदमी सदियों से इस यातना को जीता है मगर इसे समझ नहीं पा रहे है , गोया अपनी यातनाओ को देखते हुवे भी आदमी उसके प्रति अँधा बना रहता है और वह अकारण ही अँधा नहीं महज़ इसलिए क्योंकि वह कुछ कर नहीं पा रहा है अपने अंधेपन के खिलाफ । लेकीन यहाँ सवाल उठता है की आखिर आदमी इतना पीड़ित हे क्यों ? क्योकि वह नहीं जनता कि आखिर वह यहाँ क्यों है । फ्योदोर दोस्तोवस्की भी एक जगह ऐसा ही सवाल उठाते है -:कि ''इश्वर ने आखिर हमें बनाया ही क्यों '' इसी सवाल का जवाब आदमी सदियों से खोज रहा है । नीत्शे ने इस पीड़ा का बेहद गहरा अद्यन किया , इसे बेहद करीब से जाना-समझा और बदले कि भावना को लेकर उसने इश्वर कि हत्या कर दी, खंड-खंड कर दिया मानव चेतना मै बसी इश्वर कि प्रतिमा को और इसके बदले महामानवीय ज्योति को स्थापित किया , वाही दोस्तोवस्की ने ''रस्कोलनिकव''(क्राइम एंड पनिशमेंट) जेसे किरदार को जन्म दिया , लेकीन रस्कोल्निकाव अपनी मृत्यु तक इस पीड़ा को समझ नहीं पाया ।
तो एक महान कथाकार का यह तरीका होता है, सही मायनो मै एक थ्योरी जिससे जवाब कि ताकत के साथ ही सवाल कि गरिमा को भी समझा जा सके , एक किरदार आखिरकार अपने कथाकार कि गुत्थी को सुलझाने कि शमता और ताकत रखता है । इस तरह कि कृति एक महान कथाकार का अत्त्म-मंथन होती है , जहा कभी-कभी तो उसके हाथ कुछ नहीं लगता और किरदार-कथाकार एक नेराश्च्य शरण को चले जाते है और कभी तो संभावनाओ के वृक्ष पर फल असंख्य मात्र मै फलीभूत होते हे। पूर्वी दर्शन मे कई ऐसी कई कृतिया मिल के पत्थर सी स्थापित है
परन्तु पश्चिम मे नीत्शे और दोस्तोवस्की की तरह काफ्का भी अन्धकार मे बुझा हुवा दीपक लिए घूमते है (लेकीन बुझा दीपक आदमी कि नियति नहीं )लेकीन यह क्या ! आखिर काफ्का को वह मशीन मिल ही जाती है ? जो आदमी के जन्म से ही आदमी कि छाती पर अपने नुकीले पंजो के भर संहित उसे एक अनजाने दंड की सजा देती है ।
यही वह कलपुर्जा जो काफ्का को इतना महान बनता है। यह मशीन है काफ्का की लम्बी कहानी '' in the penal colony'' की । कहानी को पड़कर हमें यह ज्ञात होता हे की अंत: आदमी की कला उसके छुपे रहस्यों को साक्षात्य प्रदान करती है । यह बात पूरी तरह स्पष्टता के साथ तो नहीं कह सकता लेकिन कहानी लिख चुकने के बाद ही या कहानी लिखते हुवे ही काफ्का को इसकी भीषणता का आभास हुवा होगा । इसलिए काफक का साहित्य मात्र रोचक व मनोरंजक न होकर एक गहरा आत्ममंथन हे।
Friday, February 25, 2011
Friday, February 18, 2011
कवी-मित्र नीलोत्पल के लिए

मित्र को पत्र-कविता
पतझड़ की तरह पुरे जंगल में,
बिखरी हुई
तमाम पत्तियों की तरह ,
तुम्हारी तरह ! काश
मेरे दोस्त
मै हर सित्म बिखर सकता ! मेरे दोस्त
लेकिन यह मेरे उदास होने का समय हे
यह समय ही कुछ ऐसा हे
और निसंदेह परिस्थितिया भी...
लेकिन फिर भी में दुखी नहीं हु
उदास हु ज़रा
कुछ शनो से कुछ शनो तक
लेकिन मुझे पता नहीं था
की यह शन इतना विराट होगा
फिर भी
निषेध की सर्दी मेरी तबियत नहीं
मै आशाओ के उनी वस्त्र पहनता हूँ
............................
एक अंधियारे समय मे जीता हूँ मे
जो मुझे सूर्योदय के मूल्यों को समझाता है
ओर समझाता हे चीजों को
और चीजों के वार्तुल ओर कोस्ठ्को के अंतर बाह्य दायरे ...
जो कई तरह की नविन प्रस्फुटन से भरपूर हे
मुझे लगता हे
इसी समझ के किनारे हम मिलेगे एक दिन
जिंदादिल (क्या शब्द कहा था तुमने )
बयारो के स्वागत में बिखरे-बिखरे







